चंडीगढ़, 23 नवम्बर : पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक फैसले में कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे दो वयस्कों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य की ज़िम्मेदारी है, भले ही उनमें से एक विवाहित हो। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है और यह अधिकार किसी भी रिश्ते की नैतिक या सामाजिक स्वीकार्यता पर निर्भर नहीं करता।
यह फैसला एक महिला और एक पुरुष द्वारा दायर याचिका पर आया, जिसमें दावा किया गया था कि उन्हें अपने परिवारों और परिचितों से खतरा महसूस हो रहा है। महिला पहले से शादीशुदा थी और उसका एक बच्चा भी था, जबकि पुरुष अविवाहित था। दोनों ने कहा कि वे अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं, लेकिन उन्हें अपने रिश्तेदारों से धमकियाँ मिल रही हैं।
राज्य को अपने नैतिक विचार थोपने का कोई अधिकार नहीं
मेवात निवासी याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय से पुलिस द्वारा की गई उनकी शिकायत पर उचित कार्रवाई करने और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का अनुरोध किया। सुनवाई के दौरान, उच्च न्यायालय ने कहा कि राज्य को अपने नैतिक विचार थोपने का कोई अधिकार नहीं है, न ही सामाजिक असहमति किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों को कमज़ोर कर सकती है।
उच्च न्यायालय ने संबंधित जिला पुलिस अधिकारियों को याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर शिकायत का आकलन करने और यदि खतरे की आशंका सही पाई जाती है, तो तत्काल आवश्यक सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सुरक्षा प्रदान करने का यह आदेश किसी भी पक्ष को आपराधिक या दीवानी कार्यवाही से छूट नहीं देता है। यदि कानून के उल्लंघन का कोई मामला उठता है, तो संबंधित पक्ष सामान्य कानूनी सहारा ले सकते हैं।
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