नई दिल्ली, 5 जुलाई : विशेषज्ञों का मानना है कि भारत रूस द्वारा तालिबान 2.0 शासन को औपचारिक मान्यता देने के निर्णय को तुरंत स्वीकार नहीं करेगा। हालांकि, इस कदम से भारत को क्षेत्र में अपनी रणनीति को पुन: परिभाषित करने का अवसर मिल सकता है। पिछले एक वर्ष में भारत और काबुल के बीच संबंधों में सुधार देखा गया है, जिसमें भारत ने तालिबान 2.0 के साथ संवाद को बढ़ावा दिया है।
तालिबान ने पहलगाम हमले की निंदा की थी
तालिबान ने हाल ही में पहलगाम हमले की निंदा भी की है, जो इस बात का संकेत है कि वह भारत के प्रति अपनी स्थिति को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है। इस बीच, भारत के रणनीतिक साझेदार रूस ने इस सप्ताह तालिबान शासन को आधिकारिक मान्यता दी है, जो भारत के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है।
काबुल और इस्लामाबाद के बीच संबंधों में खटास आई हुई है, और पाकिस्तान अक्सर अपनी समस्याओं का ठीकरा तालिबान पर फोडऩे के लिए तैयार रहता है। ऐसे में भारत को इस स्थिति का लाभ उठाने का अवसर मिल सकता है।
रूस के कदम से भारत को मिला मौका
श्वञ्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक विशेषज्ञों का कहना है कि रूस का तालिबान के प्रति झुकाव भारत के लिए अपनी बात रखने का एक नया मौका हो सकता है। सरदार पटेल यूनिवर्सिटी ऑफ पुलिस, सिक्योरिटी एंड क्रिमिनल जस्टिस, राजस्थान के सहायक प्रोफेसर विनय कौरा का कहना है, ‘तालिबान के साथ रूस के संबंध भारत को अपनी भूमिका निभाने का अवसर दे सकते हैं।
मॉस्को, काबुल के साथ अपने नए रिश्ते में चीन पर निर्भरता से बचना चाहेगा। इससे भारत को क्षेत्रीय स्थिरता में रूस के साथ मिलकर काम करने का मौका मिलेगा।
पाकस्तान से छुटकारा चाहता है तालिबान
तालिबान अब पाकिस्तान से अपनी निर्भरता को कम करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। इसके तहत, वह इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (आई.एन.एस.टी.सी.) और चाबहार बंदरगाह का उपयोग वैश्विक व्यापार के लिए करना चाहता है। वर्तमान में, अफगानिस्तान को अपने व्यापार के लिए पाकिस्तान के कराची बंदरगाह पर निर्भर रहना पड़ता है, जो कि अब उसके लिए एक चुनौती बन चुका है।
आई.एन.एस.टी.सी. एक महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग है, जो भारत को रूस और यूरोप से जोड़ता है, जबकि चाबहार बंदरगाह, जो ईरान में स्थित है, भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का एक प्रमुख रास्ता प्रदान करता है। तालिबान का उद्देश्य इन दोनों मार्गों का उपयोग करके अपने व्यापारिक संबंधों को मजबूत करना है, ताकि वह पाकिस्तान पर निर्भरता को समाप्त कर सके और अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित कर सके।
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