फिरोजपुर, 11 फरवरी : नशों के खिलाफ पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया की पदयात्रा मंगलवार को उस समय राजनीतिक रूप से अहम बन गई जब अकाली दल, भाजपा और एक बड़े डेरा प्रमुख एक ही मंच पर नजर आए। इतना ही नहीं, कार्यक्रम के दौरान इन नेताओं के बीच बंद कमरे में बैठक भी हुई, जिसने सियासी हलकों में चर्चाओं को तेज कर दिया है।
इस पदयात्रा में पहले डेरा ब्यास प्रमुख बाबा गुरिंदर सिंह ढिल्लों पहुंचे। इसके बाद अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल, भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष अश्वनी शर्मा और पूर्व मंत्री राणा गुरमीत सिंह सोढ़ी की मौजूदगी ने कई राजनीतिक संकेत दिए। हालांकि अकाली दल की ओर से इसे राज्यपाल की अपील पर नशा विरोधी साझा अभियान में भागीदारी बताया जा रहा है, लेकिन घटनाक्रम के समय को लेकर चर्चाएं गर्म हैं।
बंद कमरे में करीब 17 मिनट की बैठक
जब राज्यपाल की पदयात्रा सारागढ़ी गुरुद्वारा से चलकर सरकारी एमिनेंस स्कूल पहुंची और वे मुख्य पंडाल में लोगों व विद्यार्थियों को संबोधित कर रहे थे, उसी दौरान बाबा गुरिंदर सिंह ढिल्लों, अश्वनी शर्मा, राणा सोढ़ी सहित अन्य नेता स्कूल के प्रिंसिपल कार्यालय में बैठक कर रहे थे।
करीब 17 मिनट तक चली इस बंद कमरे की बैठक के बाद सियासी गलियारों में तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि बैठक के मुद्दों पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन इसे सामान्य शिष्टाचार भेंट नहीं माना जा रहा।
सुखबीर बादल की मौजूदगी भी रही चर्चा में
राज्यपाल के संबोधन के दौरान अकाली दल अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल भी पंडाल में नजर आए। अपने भाषण में राज्यपाल ने उनका नाम लेकर स्वागत भी किया। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि डेरा प्रमुख की मौजूदगी के कुछ ही समय बाद सुखबीर बादल का पहुंचना महज संयोग नहीं माना जा रहा।
कार्यक्रम के दौरान फिरोजपुर के अकाली समर्थकों ने हलका इंचार्ज सुखपाल सिंह नन्नू की कोठी के बाहर राज्यपाल का स्वागत किया। बैठक के बाद डेरा ब्यास प्रमुख का सीधे राणा गुरमीत सिंह सोढ़ी की कोठी पर जाना भी सियासी संकेतों को मजबूत करता दिख रहा है।
क्या बन रही है नई सियासी रणनीति?
विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम पंजाब की आने वाली राजनीति में किसी बड़ी रणनीति की तैयारी की ओर इशारा कर सकता है। हालांकि अकाली दल, भाजपा या डेरा ब्यास की ओर से किसी संभावित गठबंधन को लेकर अभी तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन एक ही दिन, एक ही मंच पर मौजूदगी और अलग-अलग बैठकों ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि पंजाब की राजनीति में पर्दे के पीछे काफी कुछ चल रहा है।
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