March 11, 2026

अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता, व्यापारिक विवाद और ईएसजी की बढ़ती भूमिका पर मंथन

अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता, व्यापारिक...

चंडीगढ़, 11 मार्च : चंडीगढ़ में आयोजित इंडिया इंटरनेशनल डिस्प्यूट्स वीक के चौथे दिन अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता, सीमा-पार व्यापारिक विवादों, अवसंरचना परियोजनाओं से जुड़े मामलों और कॉरपोरेट गवर्नेंस में पर्यावरण, सामाजिक और प्रशासनिक (ईएसजी) ढांचे की बढ़ती भूमिका पर विस्तृत चर्चा की गई।

सिंगापुर इंटरनेशनल कमर्शियल कोर्ट के अंतरराष्ट्रीय न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अर्जन कुमार सिकरी ने कहा कि बदलते भू-राजनीतिक और आर्थिक माहौल में भारत को अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान के लिए एक विश्वसनीय वैश्विक “सुरक्षित बंदरगाह” के रूप में स्थापित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पूंजी, तकनीक और व्यापार के सीमाओं के पार विस्तार के साथ विवादों की संख्या भी बढ़ रही है। ऐसे में निवेशकों का विश्वास बनाए रखने के लिए निष्पक्ष और प्रभावी विवाद समाधान प्रणाली बेहद जरूरी है।

मध्यस्थता के साथ अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक अदालतों का बढ़ता महत्व

जस्टिस सिकरी ने कहा कि पारंपरिक रूप से मध्यस्थता और सुलह-समाधान अपनी लचीलापन, गोपनीयता और पक्षकारों की स्वायत्तता के कारण सीमा-पार व्यापारिक विवादों के समाधान के प्रमुख माध्यम रहे हैं। हालांकि बढ़ती लागत, देरी और निष्पक्षता से जुड़ी चिंताओं के कारण आधुनिक मध्यस्थता की आलोचना भी हो रही है। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक अदालतें अब मध्यस्थता की लचीलापन को न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता के साथ जोड़कर एक प्रभावी विकल्प के रूप में उभर रही हैं।

वैश्विक व्यापार समझौतों में बदलती प्रवृत्तियों पर चर्चा

सीमा-पार व्यापार और निवेश विवादों पर केंद्रित पैनल में वैश्विक व्यापार व्यवस्था में हो रहे बदलावों पर चर्चा हुई। सेंटर फॉर ट्रेड एंड इन्वेस्टमेंट लॉ के प्रमुख जेम्स नेडअंपारा ने कहा कि दुनिया अब बहुपक्षीय व्यापार ढांचे से हटकर द्विपक्षीय और क्षेत्रीय समझौतों की ओर बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि ऐसे समझौते देशों को स्थिरता, श्रम मानकों और पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं जैसे व्यापक मुद्दों को शामिल करने का अवसर देते हैं।

पेशेवर सेवाओं के उदारीकरण की चुनौतियां

प्रणव नारंग ने व्यापार समझौतों के तहत पेशेवर सेवाओं के उदारीकरण से जुड़ी चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कानूनी सेवाओं जैसे क्षेत्रों में नियामकीय बाधाएं अभी भी मौजूद हैं। वहीं जोशुआ फाँग ने द्विपक्षीय निवेश संधियों के तहत वाणिज्यिक मध्यस्थता और निवेशक-राज्य मध्यस्थता के बीच अंतर को स्पष्ट किया। एक अन्य पैनल में अवसंरचना, निर्माण और ऊर्जा परियोजनाओं से जुड़े विवादों पर चर्चा की गई। इस सत्र का संचालन वी.आर. नीलाकांतन ने किया।

गगन आनंद ने कहा कि अवसंरचना परियोजनाओं में मध्यस्थता का उद्देश्य अदालतों का बोझ कम करना था, लेकिन कई मामलों में विभिन्न चरणों पर न्यायिक हस्तक्षेप देखने को मिलता है। सार्थक गुप्ता ने मध्यस्थों की जवाबदेही और बढ़ती लागत को लेकर चिंता जताई, जबकि अमित बंसल ने संस्थागत मध्यस्थता और स्पष्ट प्रवर्तन तंत्र की आवश्यकता पर जोर दिया।

कॉरपोरेट गवर्नेंस में ईएसजी का बढ़ता महत्व

सम्मेलन के दौरान कॉरपोरेट गवर्नेंस और व्यावसायिक नियमन में ईएसजी मानकों की भूमिका पर भी विशेष चर्चा हुई। पैनल का संचालन कोमल कारनिक ने किया। इस दौरान तारिणी मेहता ने कहा कि ईएसजी को केवल अनुपालन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और जैव विविधता के नुकसान जैसे वैश्विक संकटों से निपटने के लिए एक महत्वपूर्ण जोखिम-प्रबंधन ढांचे के रूप में समझना चाहिए।

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