नई दिल्ली, 24 मार्च : नई दिल्ली में All India Institute of Medical Sciences में हरिश राणा का निधन हो गया। वे भारत में पैसिव यूथेनेशिया (इच्छा मृत्यु) की अनुमति पाने वाले शुरुआती मामलों में शामिल थे। हालांकि खबर लिखे जाने तक अस्पताल की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई थी। एक हादसे के बाद हरिश राणा पिछले 13 वर्षों से कोमा में थे। उनके माता-पिता और भाई ने इलाज के लिए देशभर के विशेषज्ञों से संपर्क किया और हर संभव प्रयास किया, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
परिवार ने अंततः सम्मानजनक मृत्यु की मांग को लेकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। इस मामले में अदालत ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति प्राप्त हुई। यह निर्णय न केवल परिवार के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ था, बल्कि यह समाज में इस संवेदनशील मुद्दे पर चर्चा को भी प्रोत्साहित करता है।
अदालत के इस फैसले ने यह स्पष्ट किया कि जीवन और मृत्यु के अधिकारों के संदर्भ में न्यायिक प्रणाली की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। इस प्रकार, सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल एक व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा की, बल्कि समाज में मानवता और गरिमा के मूल्यों को भी उजागर किया।
अंगदान की जताई इच्छा
परिवार ने हरिश राणा के अंग दान करने की इच्छा भी जताई है। डॉक्टरों के अनुसार, उनकी स्थिति के आधार पर किडनी, लिवर, हार्ट, फेफड़े, पैनक्रियास और आंतों के साथ-साथ कॉर्निया और हार्ट वाल्व दान किए जा सकते हैं, हालांकि अंतिम निर्णय मेडिकल जांच के बाद लिया जाएगा। AIIMS के विशेषज्ञों की निगरानी में इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से पूरी की गई। हरिश राणा के निधन के साथ एक लंबी कानूनी और भावनात्मक लड़ाई का अंत हो गया।

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