नई दिल्ली, 5 मार्च : Iran और Israel के बीच बढ़ते तनाव के बीच ड्रोन युद्ध एक बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया है। ईरान के सस्ते लेकिन प्रभावी कामीकाज़े ड्रोन महंगी एयर डिफेंस मिसाइलों को चुनौती दे रहे हैं।
ईरान के Shahed-131 drone और Shahed-136 drone जैसे ड्रोन केवल 20,000 से 50,000 डॉलर की लागत में बनाए जाते हैं, जबकि इन्हें गिराने के लिए इस्तेमाल होने वाली कई इंटरसेप्टर मिसाइलों की कीमत 40 लाख डॉलर तक होती है। यही कारण है कि ये सस्ते ड्रोन युद्ध में बड़ी चुनौती बन गए हैं।
सस्ते ड्रोन बन रहे बड़ी चुनौती
ईरान की सैन्य रणनीति में इन ड्रोन की अहम भूमिका है। इन्हें बड़ी संख्या में लॉन्च कर दुश्मन की राडार और एयर डिफेंस सिस्टम को भ्रमित किया जाता है। ये ड्रोन सैकड़ों मील की दूरी तय कर सैन्य ठिकानों, तेल सुविधाओं और रणनीतिक इमारतों को निशाना बना सकते हैं। इनकी ताकत तेज गति या अत्याधुनिक स्टील्थ तकनीक नहीं, बल्कि कम लागत और बड़े पैमाने पर उत्पादन है।
इंटरसेप्टर मिसाइलों की लागत से बड़ा अंतर
रिपोर्टों के अनुसार ईरान अब तक 2000 से अधिक ड्रोन हमलों में इस्तेमाल कर चुका है। अमेरिका के एयर डिफेंस सिस्टम जैसे Patriot missile system और THAAD missile defense system लगभग 90-96% इंटरसेप्शन दर रखते हैं, लेकिन समस्या यह है कि
- एक ड्रोन की कीमत लगभग 20,000 डॉलर
- जबकि उसे गिराने वाली मिसाइल की कीमत मिलियन डॉलर तक होती है
यानी भले ही ड्रोन मार गिराया जाए, फिर भी लागत का नुकसान रक्षक पक्ष को ज्यादा होता है।
ड्रोन युद्ध का बदलता समीकरण
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्ध में कम लागत वाले ड्रोन बड़े और महंगे हथियारों को चुनौती दे रहे हैं। ईरान की रणनीति दिखाती है कि सस्ते लेकिन बड़ी संख्या में इस्तेमाल किए गए हथियार महंगे रक्षा सिस्टम के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं। अगर यही रुझान जारी रहा, तो आने वाले समय में ड्रोन युद्ध वैश्विक सैन्य रणनीति का अहम हिस्सा बन सकता है।

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