नई दिल्ली, 30 दिसम्बर : भारत ने इस वर्ष चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया के सबसे बड़े चावल उत्पादक देश के रूप में अपनी पहचान बनाई है। सरकार और कृषि क्षेत्र से जुड़े समूह इसे किसानों और नीतिगत सुधारों की सफलता बता रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे कहीं अधिक चिंताजनक तस्वीर पेश कर रही है।
भारत की मजबूत पकड़
पिछले एक दशक में भारत ने चावल निर्यात लगभग दोगुना कर दिया है। बीते वित्त वर्ष में चावल की शिपमेंट 20 मिलियन मीट्रिक टन के पार पहुंच गई, जिससे वैश्विक चावल व्यापार में भारत की हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत हो गई है।
किसानों की चिंता: गिरता भूजल स्तर
चावल उत्पादन के प्रमुख राज्य पंजाब और हरियाणा में हालात गंभीर होते जा रहे हैं। किसानों और सरकारी आंकड़ों के अनुसार, एक दशक पहले जहां भूजल 30 फीट की गहराई पर उपलब्ध था, वहीं अब 80 से 200 फीट तक बोरवेल खोदने पड़ रहे हैं। इससे किसानों पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। हरियाणा के किसान बलकार सिंह का कहना है,
“हर साल बोरवेल और गहरा करना पड़ता है। यह प्रक्रिया अब बेहद महंगी होती जा रही है।”
सब्सिडी नीति पर सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि चावल उत्पादन को बढ़ावा देने वाली सरकारी सब्सिडियां किसानों को कम पानी वाली फसलों की ओर जाने से रोक रही हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में पिछले दशक में लगभग 70 प्रतिशत की बढ़ोतरी और मुफ्त या सस्ती बिजली जैसी सुविधाएं भूजल के अत्यधिक दोहन को बढ़ावा दे रही हैं। इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के अविनाश किशोर के अनुसार, भारत जैसे जल-संकटग्रस्त देश में किसानों को बड़ी मात्रा में भूजल निकालने के लिए प्रोत्साहित किया जाना एक गंभीर नीति विरोधाभास है।
कृषि सुधारों पर राजनीतिक दबाव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लाए गए कृषि सुधारों का उद्देश्य निजी खरीद को बढ़ावा देना था, लेकिन एमएसपी खत्म होने की आशंका के चलते बड़े पैमाने पर किसान आंदोलन हुए। इसके बाद सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत अपनी घरेलू जरूरत से कहीं अधिक चावल पैदा करता है। ऐसे में उत्पादन या निर्यात में किसी भी तरह का बदलाव वैश्विक बाजार को प्रभावित कर सकता है।
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