चंडीगढ़, 8 जनवरी : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि पंजाब सरकार वित्तीय संकट का सामना कर रही थी, तो उसे इसका बोझ सेवानिवृत्त कर्मचारियों पर डालने के बजाय अपने फिजूल खर्चों और बेकार योजनाओं में कटौती करनी चाहिए थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार ने अपने दायित्व पूरे कर चुके कर्मचारियों को निशाना बनाया, जो न्यायसंगत नहीं है।
पेंशन कम्यूटेशन दर बढ़ाने वाला सर्कुलर रद्द
हाईकोर्ट ने 29 जुलाई 2003 के उस सर्कुलर को सेवानिवृत्त कर्मचारियों पर लागू करने से इनकार कर दिया, जिसमें पेंशन कम्यूटेशन की डिस्काउंट दर 4.75 प्रतिशत से बढ़ाकर 8 प्रतिशत कर दी गई थी। अदालत ने कहा कि यह फैसला कर्मचारियों के हितों के खिलाफ है। 31 जुलाई 2003 से 30 अक्टूबर 2006 के बीच सेवानिवृत्त हुए कर्मचारियों द्वारा दायर करीब 25 याचिकाओं को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने पंजाब सरकार को निर्देश दिया कि वह पुराने, अधिक लाभकारी टेबल के अनुसार पेंशन कम्यूटेशन लाभों की दोबारा गणना करे और 31 मार्च तक अतिरिक्त राशि का भुगतान करे।
सरकार ने पुरानी दर बहाल की, पर लाभ देने से किया इनकार
अदालत ने यह भी नोट किया कि पंजाब सरकार ने 31 अक्टूबर 2006 के सर्कुलर के जरिए पुरानी 4.75 प्रतिशत दर तो बहाल कर दी थी, लेकिन इससे पहले सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पुराने लाभ देने से इनकार कर दिया था। जस्टिस अनूप चितकारा और सुखविंदर कौर की बेंच ने कहा कि पेंशन कम्यूटेशन एक वैधानिक कल्याणकारी योजना है और सेवानिवृत्ति के बाद सुरक्षा का एक अनिवार्य हिस्सा है।
बेंच ने कहा कि जिन कर्मचारियों ने अपना अधिकांश जीवन राज्य की सेवा और विकास में लगाया है, वे सेवानिवृत्ति के बाद सरकार से सहायता की अपेक्षा रखने के पूरी तरह हकदार हैं।
फिजूलखर्ची कम करने के बजाय कर्मचारियों पर डाला बोझ
कोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर चिंता जताते हुए कहा कि यदि वास्तव में वित्तीय संकट था, तो सरकार को गैर-जरूरी विज्ञापनों बिलबोर्ड्स और केवल वोट बैंक के लिए चलाई जा रही योजनाओं पर खर्च कम करना चाहिए था। इसके बजाय सरकार ने अपने सेवाकाल पूरे कर चुके कर्मचारियों को निशाना बनाया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय केवल याचिकाकर्ताओं पर ही लागू होगा और करीब 19 साल बाद मामलों को दोबारा खोलना उचित नहीं होगा।
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