नई दिल्ली, 3 मार्च : ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामनेई के निधन को 48 घंटे से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन भारत की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दौरान यूएई, सऊदी अरब, बहरीन और इजराइल के शीर्ष नेतृत्व से फोन पर बातचीत कर हालिया हमलों पर चिंता जताई है।
अमेरिका-इजराइल के संयुक्त हमलों के बाद ईरान द्वारा खाड़ी देशों पर की गई जवाबी कार्रवाई ने पूरे पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा दिया है। ऐसे में भारत की संतुलनकारी नीति को लेकर कूटनीतिक हलकों में नई बहस छिड़ गई है।
‘भावनात्मक नहीं, रणनीतिक’ है क्षेत्रीय राजनीति
विदेश मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि कई इस्लामी देशों ने भी खामनेई के निधन पर तत्काल प्रतिक्रिया नहीं दी है। क्षेत्रीय राजनीति भावनात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक हितों से संचालित होती है। भारत भी परिस्थितियों का आकलन कर सावधानीपूर्वक कदम उठाना चाहता है।
एक अधिकारी ने बताया कि कूटनीति का मूल उद्देश्य अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करना है। ईरान में जहां लगभग 8 से 10 हजार भारतीय हैं, वहीं खाड़ी देशों में करीब एक करोड़ भारतीय काम करते हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।
हाल ही में ओमान में एक तेल टैंकर पर हमले में एक भारतीय की मौत भी हुई है। यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं, जिन पर बढ़ते क्षेत्रीय तनाव का सीधा असर पड़ सकता है।
पिछले कुछ वर्षों में बदला संतुलन
पूर्व भारतीय राजनयिक राकेश सूद का कहना है कि यह कोई अचानक आया बदलाव नहीं है। पिछले छह-सात वर्षों से भारत ने खाड़ी देशों और इजराइल के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया है।
प्रधानमंत्री मोदी पिछले वर्षों में तीन बार सऊदी अरब, सात बार यूएई और दो बार इजराइल का दौरा कर चुके हैं। यूएई के साथ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) हुआ है, इजराइल को विशेष रणनीतिक साझेदार का दर्जा मिला है और सऊदी अरब के साथ रक्षा, ऊर्जा और निवेश जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा है।
इसके मुकाबले, ईरान के साथ उच्चस्तरीय संपर्क सीमित रहे हैं। किसी भारतीय प्रधानमंत्री की ईरान यात्रा आखिरी बार 2016 में हुई थी। 2018 में ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति हसन रूहानी भारत आए थे।
चाबहार और तेल आयात पर असर
भारत-ईरान संबंधों में चाबहार बंदरगाह को अहम परियोजना माना गया था, लेकिन अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण प्रगति प्रभावित हुई। भारत ने 2019 के बाद से ईरान से तेल आयात बंद कर दिया है, जबकि एक समय ईरान भारत के शीर्ष तीन तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल था।
हालिया बजट में चाबहार परियोजना के लिए विशेष प्रावधान न होना भी बदले हुए समीकरणों की ओर संकेत करता है।
‘डी-हाइफनेशन’ नीति पर सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक “डी-हाइफनेशन” नीति—जिसमें इजराइल और ईरान के साथ संबंधों को अलग-अलग ट्रैक पर रखा जाता था—अब मौजूदा भू-राजनीतिक माहौल में चुनौतीपूर्ण हो गई है।
भारत की प्राथमिकताएं अब ऊर्जा सुरक्षा, खाड़ी देशों में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा और उभरती आर्थिक साझेदारियों की ओर अधिक स्पष्ट रूप से झुकती दिखाई दे रही हैं। पश्चिम एशिया में बदलते समीकरणों के बीच भारत व्यावहारिक और संतुलित कूटनीति के रास्ते पर आगे बढ़ता नजर आ रहा है।

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