नई दिल्ली, 4 जनवरी : केंद्र सरकार संसद के आगामी बजट सत्र में विवादित बिजली संशोधन विधेयक 2025 पेश करने की तैयारी कर रही है। सूत्रों के अनुसार, विधेयक के मसौदे पर विभिन्न पक्षों से सुझाव प्राप्त हो चुके हैं और अब बिजली मंत्रालय बिजली उद्योग, यूनियनों व अन्य हितधारकों के साथ औपचारिक बैठकें शुरू करेगा। 22 और 23 जनवरी को राज्य सरकारों के साथ इस विधेयक पर विस्तृत परामर्श किया जाएगा। बिजली मंत्रालय का कहना है कि सभी राज्यों की चिंताओं को ध्यान में रखकर आगे की प्रक्रिया तय की जाएगी।
किसानों में बढ़ी चिंता
खासतौर पर पंजाब के किसानों में आशंका है कि इस विधेयक से बिजली की दरें बढ़ सकती हैं, जिससे उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। किसानों का मानना है कि लागत आधारित टैरिफ से कृषि क्षेत्र प्रभावित हो सकता है। सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि प्राथमिकता वाले उपभोक्ताओं (घरेलू और कृषि क्षेत्र) के लिए बिजली की कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं होगी। राज्य सरकारें इन वर्गों को पहले की तरह सब्सिडी देती रहेंगी। केंद्रीय बिजली मंत्री मनोज लाल खट्टर ने भी भरोसा दिलाया है कि किसानों और घरेलू उपभोक्ताओं पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा।
लागत आधारित टैरिफ पर जोर
विधेयक में बिजली दरें लागत के आधार पर तय करना अनिवार्य होगा। यदि वितरण कंपनियां समय पर दरें तय नहीं करतीं, तो राज्य बिजली नियामक आयोगों को स्वयं कार्रवाई करने का अधिकार दिया जाएगा। सरकार का कहना है कि बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) की वित्तीय हालत चिंताजनक है। अनुमान के अनुसार 2018-19 से 2023-24 के बीच डिस्कॉम्स को कुल 3.4 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इसी कारण बिजली अधिनियम 2003 में सुधार का प्रस्ताव लाया गया है।
प्रतिस्पर्धा बढ़ाने का लक्ष्य
मंत्री खट्टर ने कहा कि विधेयक का उद्देश्य बिजली क्षेत्र में आर्थिक प्रतिस्पर्धा को बढ़ाना है ताकि उद्योगों को उचित दर पर बिजली मिल सके और देश के नागरिकों को दीर्घकालीन लाभ हो। सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस विधेयक से न तो बिजली क्षेत्र का जबरन निजीकरण होगा और न ही कर्मचारियों की नौकरियों पर कोई खतरा है।
बड़े उपभोक्ताओं को नोटिस देकर मौजूदा व्यवस्था से बाहर निकलने का विकल्प भी दिया जाएगा। बिजली लाइनों के लिए भूमि उपयोग के मामलों में किसानों को उचित मुआवजा देने का आश्वासन भी दिया गया है।
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