नई दिल्ली, 17 जनवरी : महाराष्ट्र की बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भारी जीत की ओर बढ़ती नजर आ रही है। शुरुआती रुझानों के मुताबिक भाजपा 29 में से 23 सीटों पर आगे चल रही है। ऐसे में ठाकरे भाइयों—उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे—की चुनावी रणनीति असफल होती दिख रही है।
बीएमसी चुनावों से पहले महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा मोड़ तब आया, जब करीब 20 साल से अलग चल रहे चचेरे भाई उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक मंच पर आए। इस बहुचर्चित गठबंधन का मकसद मराठी वोट बैंक को एकजुट करना और एकनाथ शिंदे से अपनी राजनीतिक विरासत वापस हासिल करना था, जो फिलहाल शिवसेना के नाम और चुनाव चिन्ह दोनों पर नियंत्रण रखते हैं।
मराठी वोट एकजुट करने की कोशिश नाकाम
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक ठाकरे भाइयों का यह गठबंधन जमीन पर प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहा। मराठी वोटों के बिखराव को रोकने की रणनीति काम नहीं आई और भाजपा ने शहरी मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ और मजबूत कर ली। उद्धव ठाकरे के लिए यह गठबंधन एक तरह से मजबूरी का कदम माना जा रहा था। उन्होंने पहले भाजपा से नाता तोड़कर कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी के साथ गठबंधन कर बड़ा राजनीतिक दांव खेला था।
हालांकि 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में उस गठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा, जिसके बाद ठाकरे भाइयों का साथ आना राजनीतिक मजबूरी के तौर पर देखा गया।
बीएमसी: उद्धव ठाकरे का आखिरी मजबूत किला
बीएमसी चुनाव इसलिए भी अहम माने जा रहे थे क्योंकि यह नगर निगम एशिया के सबसे अमीर नगर निकायों में से एक है। शिवसेना करीब 25 साल तक बीएमसी की सत्ता पर काबिज रही है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) के लिए यह चुनाव अपने आखिरी मजबूत गढ़ को बचाने की लड़ाई जैसा था। भाजपा की निर्णायक बढ़त ने महाराष्ट्र की राजनीति के समीकरण बदल दिए हैं। अब यह साफ होता जा रहा है कि ठाकरे भाइयों का गठबंधन न तो भाजपा की रफ्तार रोक पाया और न ही उद्धव ठाकरे को राजनीतिक संजीवनी दे सका।
यह भी देखें : ईडी ने अल फलाह यूनिवर्सिटी की 140 करोड़ रुपये की संपत्ति की कुर्की

More Stories
फोरेंसिक जांच में वीडियो से छेड़छाड़ नहीं पाई गई: स्पीकर
सूरज ही नहीं, मंगल ग्रह भी तय करता है पृथ्वी का मौसम
ईडी ने अल फलाह यूनिवर्सिटी की 140 करोड़ रुपये की संपत्ति की कुर्की