February 4, 2026

युवराज सिंह ने बताई रिटायरमेंट की असली वजह

युवराज सिंह ने बताई रिटायरमेंट...

चंडीगढ़, 29 जनवरी : भारतीय क्रिकेट के दिग्गज ऑलराउंडर युवराज सिंह ने आखिरकार अपने संन्यास के पीछे की असली वजह का खुलासा किया है। एक इंटरव्यू में युवराज ने बताया कि अपने करियर के अंतिम दौर में उन्होंने क्रिकेट का आनंद लेना ही छोड़ दिया था और खुद से सवाल करने लगे थे कि वह खेल क्यों रहे हैं।

आनंद और सम्मान की कमी ने किया मजबूर

युवराज सिंह ने सानिया मिर्जा के यूट्यूब चैनल पर बातचीत के दौरान कहा, “मैं अपनी खेल का आनंद नहीं ले रहा था। जब आनंद ही नहीं था तो क्रिकेट खेलने का क्या मतलब? मुझे समर्थन महसूस नहीं हो रहा था, न ही सम्मान।” उन्होंने आगे कहा कि वह मानसिक और शारीरिक रूप से अब और कुछ देने की स्थिति में नहीं थे और यह स्थिति उन्हें अंदर से दुखी कर रही थी। “जिस दिन मैंने संन्यास लिया, उस दिन मुझे फिर से खुद जैसा महसूस हुआ,” युवराज ने कहा।

भारतीय जीतों के नायक रहे युवराज

युवराज सिंह को भारत के महान व्हाइट-बॉल क्रिकेटरों में गिना जाता है। उन्होंने 2007 आईसीसी टी-20 विश्व कप और 2011 वनडे विश्व कप जीत में अहम भूमिका निभाई।
2011 विश्व कप में उनके शानदार प्रदर्शन के लिए उन्हें प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट चुना गया। यह उपलब्धि इसलिए भी खास थी क्योंकि बाद में पता चला कि वह पूरे टूर्नामेंट के दौरान कैंसर से जूझ रहे थे।

उम्र बढ़ने के साथ बढ़ी आलोचना

हालांकि, समय के साथ उम्र बढ़ी और उनके सुनहरे दौर की वजह से उनसे उम्मीदें आसमान छूने लगीं। इसी के साथ आलोचनाएं भी तेज हो गईं। युवराज ने माना कि उन्हें अपने करियर के आखिरी वर्षों में समर्थन और सम्मान की कमी महसूस हुई, जिसने अंततः उन्हें संन्यास लेने की ओर धकेल दिया। युवराज ने यह भी याद किया कि उनके करियर के शुरुआती दौर में भी उनकी प्रतिभा पर सवाल उठाए गए थे।

उन्होंने बताया कि जब वह किशोर थे, तब पूर्व भारतीय बल्लेबाज नवजोत सिंह सिद्धू ने एक बार उन्हें नकार दिया था। युवराज ने कहा, “मैं तब सिर्फ 13-14 साल का था और अभी खेल को समझ ही रहा था। शायद उन्हें मुझे सही से देखने का समय नहीं मिला।”

योगराज सिंह की प्रतिक्रिया

इस घटना को युवराज के पिता योगराज सिंह ने निजी तौर पर लिया। युवराज ने याद करते हुए कहा, “पापा ने मुझसे कहा ‘चल बेटा, मैं तुझे दिखाता हूं क्रिकेट कैसे खेलते हैं।’ युवराज सिंह की यह ईमानदार स्वीकारोक्ति बताती है कि महान खिलाड़ियों के लिए भी मानसिक सुकून और सम्मान उतना ही जरूरी होता है, जितनी कि उपलब्धियां।

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