नई दिल्ली, 17 मार्च : हाल ही में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump ने कई देशों से होरमुज़ जलडमरूमध्य पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए युद्धपोत भेजने की अपील की थी। उन्होंने ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और चीन जैसे देशों से सहयोग मांगा, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया की सबसे शक्तिशाली नौसेना भी इस रणनीतिक जलमार्ग पर स्थायी कब्जा नहीं कर सकती।
Strait of Hormuz दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 20-30% वहन करता है। यह अपने सबसे संकरे हिस्से में केवल 34 किलोमीटर चौड़ा है, जबकि जहाजों के लिए सुरक्षित मार्ग मात्र 4 किलोमीटर का है। इतनी सीमित जगह में बड़े युद्धपोतों की आवाजाही बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाती है।
भूगोल और ईरान की बढ़त
ईरान की भौगोलिक स्थिति उसे इस क्षेत्र में रणनीतिक बढ़त देती है। उसके उत्तरी तट से मिसाइल और ड्रोन हमले करना आसान है, जबकि बड़े अमेरिकी जहाजों को मोड़ने के लिए लंबा घेरा चाहिए होता है, जिससे वे आसान निशाना बन जाते हैं।
Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) ने खास तौर पर इस क्षेत्र के लिए अपनी सैन्य रणनीति तैयार की है। उसके पास हजारों एंटी-शिप मिसाइलें, बैलिस्टिक सिस्टम, ड्रोन और समुद्री बारूदी सुरंगें हैं।
“स्वार्म अटैक” यानी झुंड में छोटे-छोटे तेज़ जहाजों से हमला करने की रणनीति अमेरिकी बेड़े के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
लॉजिस्टिक और सैन्य चुनौतियां
इस जलडमरूमध्य से रोजाना 60 से ज्यादा तेल टैंकर गुजरते हैं, जिनकी सुरक्षा के लिए लगातार गश्त जरूरी है। इसके लिए अमेरिका को अपनी वैश्विक नौसेना का बड़ा हिस्सा यहां तैनात करना पड़ेगा, जिससे अन्य क्षेत्रों में उसकी क्षमता कमजोर हो सकती है।
साथ ही, बहरीन जैसे बेस भी ईरानी मिसाइलों की रेंज में आते हैं।
राजनीतिक समर्थन की कमी
जापान और चीन जैसे बड़े तेल आयातक देश भी सैन्य हस्तक्षेप से बच रहे हैं। ऐसे में अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय समर्थन सीमित मिल रहा है, जिससे ऑपरेशन और मुश्किल हो जाता है। Operation Earnest Will के दौरान भी अमेरिका ने आंशिक सुरक्षा तो दी थी, लेकिन जलडमरूमध्य पर पूरा नियंत्रण हासिल नहीं कर सका था। इससे साफ है कि इस क्षेत्र में सैन्य प्रभुत्व कायम करना बेहद जटिल है।
ईरान ने हाल ही में कहा है कि होरमुज़ जलडमरूमध्य अमेरिका और उसके सहयोगियों को छोड़कर अन्य देशों के लिए खुला रहेगा। इस कदम को वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे तेल आपूर्ति और भू-राजनीतिक तनाव पर असर पड़ सकता है।

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