नई दिल्ली, 28 मार्च : सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने धार्मिक अवसरों पर सार्वजनिक अवकाश को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता में सार्वजनिक छुट्टी की मांग करने का अधिकार शामिल नहीं है।
अदालत ने कहा कि किसी भी धार्मिक अवसर पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करना पूरी तरह से सरकार (कार्यपालिका) का नीतिगत निर्णय है, इसमें न्यायालय का हस्तक्षेप उचित नहीं है। कोर्ट ने गुरु गोबिंद सिंह के प्रकाश पर्व को देशभर में गजटेड छुट्टी घोषित करने की मांग को भी खारिज कर दिया। अदालत ने उनके प्रति गहरा सम्मान व्यक्त करते हुए कहा कि उनका जीवन साहस, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल है।
सिख धर्म के मूल्यों पर टिप्पणी
अदालत ने कहा कि सिख धर्म ईमानदार मेहनत, स्मरण और निस्वार्थ सेवा पर जोर देता है। कोर्ट के अनुसार, गुरु गोबिंद सिंह की विरासत का सम्मान करने का सबसे अच्छा तरीका समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाना है। यह फैसला जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने दिया। ऑल इंडिया शिरोमणि सिंह सभा की याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि यह मामला अनुच्छेद 32 के तहत न्यायिक हस्तक्षेप के योग्य नहीं है।
ज्यादा छुट्टियां प्रशासन पर बोझ
अदालत ने कहा कि भारत के संघीय ढांचे में राज्यों को स्थानीय जरूरतों और सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर छुट्टियां तय करने का अधिकार है। अनुच्छेद 14 के तहत समानता का अधिकार “वाजिब भिन्नता” की अनुमति देता है, इसलिए अलग-अलग राज्यों में अलग छुट्टियां भेदभाव नहीं मानी जा सकतीं। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि इस तरह की मांगें स्वीकार की जाती हैं, तो अलग-अलग समुदायों से समान मांगों की बाढ़ आ सकती है। इससे छुट्टियों की संख्या बढ़ेगी और प्रशासनिक कामकाज तथा उत्पादकता पर नकारात्मक असर पड़ेगा।

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