चंडीगढ़, 14 सितंबर 2026: “मैं इसे सिर्फ एक बार आज़माऊँगा।” “मैं जब चाहूँ, इसे छोड़ सकता हूँ।” या यह सोच कि लंबे समय तक नशा करने के बाद भी “रिहैबिलिटेशन केंद्र में इलाज आसानी से हो जाएगा।” नशे के प्रयोग की ओर बढ़ रहे किसी युवा को ये बातें भले ही सामान्य लगें, लेकिन ऐसी धारणाएँ केवल चिंताजनक ही नहीं- बल्कि बेहद ख़तरनाक भी हो सकती हैं।
भगवंत मान सरकार ‘स्कूल नशेआँ विरुद्ध’ पाठ्यक्रम के माध्यम से युवाओं में नशे के सेवन को रोकने के लिए ऐसी धारणाओं को चुनौती देने और उन्हें दूर करने का प्रयास कर रही है। सीईजीए, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले और नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी व एस्थर डुफ्लो द्वारा सह-स्थापित शोध संस्था J-PAL के सहयोग से विकसित यह साक्ष्य-आधारित पाठ्यक्रम युवाओं के बीच नशीले पदार्थों, विशेष रूप से ओपिओइड्स की लत के जोखिम को कम करके आँकने की प्रवृत्ति पर ध्यान केंद्रित करता है।
ऐसी गलत धारणाएँ युवाओं में नशे के प्रयोग की संभावना बढ़ा सकती हैं और आगे चलकर लत का कारण बन सकती हैं।पाठ्यक्रम इस बात पर ज़ोर देता है कि नशे के ख़िलाफ़ लड़ाई नशे की लत लग जाने के बाद नहीं, बल्कि उससे बहुत पहले शुरू होनी चाहिए—ऐसे भ्रमों को दूर करके, जो नशे के सेवन को वास्तविकता से कम ख़तरनाक दिखाते हैं।
पाठ्यक्रम में युवाओं के बीच नशे से संबंधित कई प्रमुख भ्रांतियों की पहचान की गई है, जिनका समाधान आवश्यक है।
पहली और शायद सबसे ख़तरनाक भ्रांति यह है कि चिट्टा या हेरोइन को एक या कुछ बार आज़माने से लत नहीं लगती। वास्तविकता यह है कि हेरोइन अत्यधिक नशीला पदार्थ है और इसके एक बार सेवन से भी लत लगने का जोखिम हो सकता है।
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