नई दिल्ली, 11 सितम्बर : इस साल मानसून ने जमकर कहर बरपाया। लगातार बारिश से भारत पूरी तरह जलमग्न हो गया- उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक, हर तरफ भारी बारिश हुई। लेकिन अब मौसम विज्ञानी एक और बड़े बदलाव पर गौर कर रहे हैं, जो आने वाली सर्दियों को लेकर गंभीर संकेत दे रहा है। संकेत मिल रहे हैं कि इस बार देश में कड़ाके की ठंड पड़ सकती है और इसकी वजह है- ला नीना का फिर से सक्रिय होना।
आपको बता दें कि अमेरिका की प्रतिष्ठित जलवायु एजेंसी एनओएए (नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन) ने अनुमान जताया है कि इस साल के अंत तक ला नीना की वापसी संभव है, जो भारत समेत एशिया के बड़े हिस्से में सर्दी के तीव्र प्रभाव के लिए जिम्मेदार हो सकती है।
ला नीना क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
ला नीना एक प्राकृतिक मौसम चक्र है जिसमें मध्य प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक ठंडा हो जाता है। इसका सीधा असर पृथ्वी के वायुमंडलीय दबाव और मौसम के पैटर्न पर पड़ता है।
भारत में यह मजबूत मानसून और कम तापमान लेकर आता है।
इससे दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के कई हिस्सों में सूखा पड़ता है।
इससे वैश्विक तापमान में भी मामूली गिरावट आती है।
इसके विपरीत, यही महासागरीय क्षेत्र अल नीनो के दौरान गर्म हो जाता है, जिससे भारत में गर्मी और सूखे की स्थिति बढ़ सकती है।
जानिए इस साल क्यों पड़ेगी ज़्यादा ठंड?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अगले कुछ महीनों में ला नीना सक्रिय हो जाता है, तो इससे भारत में सर्दियाँ और भी तीव्र और लंबी हो सकती हैं। सर्दी जल्दी शुरू हो सकती है और न्यूनतम तापमान सामान्य से नीचे गिरने की संभावना है।
एनओएए के अनुसार, सितंबर और नवंबर के बीच ला नीना विकसित होने की 53% संभावना है।
वर्ष के अंत तक यह आंकड़ा 58% तक पहुंच सकता है।
यदि यह चक्र सक्रिय रहा तो इसका प्रभाव मार्च-अप्रैल तक जारी रह सकता है।
इसका वैश्विक प्रभाव भी देखने को मिलेगा।
– ला नीना के कारण न केवल भारत बल्कि इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, लैटिन अमेरिका और अमेरिका के कुछ हिस्सों में भी मौसम में बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे।
अटलांटिक महासागर में तूफानों की संख्या और तीव्रता बढ़ सकती है।
एशिया में और अधिक बर्फबारी हो सकती है।
अमेरिका के पश्चिमी भागों में अत्यधिक ठंड और बारिश हो सकती है।
क्या ला नीना पहले की तरह ही शक्तिशाली होगा?
वैज्ञानिक इसे कमज़ोर या मध्यम ला नीना कह रहे हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इसके प्रभाव को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। मौसम विज्ञानी इसे ‘ब्लूप्रिंट प्रभाव’ कह रहे हैं – यानी यह पूरी तरह से भविष्यवाणी तो नहीं करता, लेकिन मौसम के रुझान को ज़रूर दर्शाता है।
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