मॉस्को, 9 जनवरी : भारत ने अपनी रक्षा खरीद के लिए कई दशकों से रूस पर निर्भरता बनाए रखी है, जिसमें लड़ाकू विमानों से लेकर एयर डिफेंस सिस्टम तक शामिल हैं। हाल के वर्षों में, भारत ने इस निर्भरता को कम करने के प्रयास किए हैं और अन्य देशों से फाइटर जेट और विभिन्न हथियारों की खरीद की है। फिर भी, एयर डिफेंस के क्षेत्र में भारत की निर्भरता रूस पर बनी हुई है, विशेष रूप से S-400 एयर डिफेंस सिस्टम पर, जो कि भारत की हवाई सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इस सिस्टम ने पिछले वर्ष पाकिस्तान के खिलाफ अपनी क्षमता का प्रभावी प्रदर्शन किया। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस पर अत्यधिक निर्भरता एक रणनीतिक जोखिम उत्पन्न कर सकती है, जिससे भारत की सुरक्षा नीति में संतुलन बनाए रखना आवश्यक हो जाता है।
S-400 एयर डिफेंस के साथ चुनौतियां
भारत ने रूस से अल्माज-एंटे ‘ट्रायम्फ’ S-400 इंटीग्रेटेड एयर एंड मिसाइल डिफेंस सिस्टम की खरीदारी की है, जैसा कि द वायर की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है। यह महत्वपूर्ण सौदा 2018 में संपन्न हुआ था, और 2023 के मध्य तक भारत ने 5.5 अरब डॉलर में खरीदे गए पांच S-400 रेजिमेंट में से तीन को सक्रिय रूप से तैनात कर दिया। ऑपरेशन सिंदूर के बाद, भारत ने रूस के साथ कम से कम पांच और S-400 या उन्नत S-500 सिस्टम की खरीद के लिए बातचीत शुरू की है।
हाल ही में, भारत के तीन S-400 यूनिट ने पाकिस्तान के साथ चार दिन के संघर्ष के दौरान हवाई खतरों का प्रभावी ढंग से सामना किया। उल्लेखनीय है कि रूस ने भी इस सिस्टम का उपयोग यूक्रेन के साथ चल रहे युद्ध में किया है। हालांकि, इन ऑपरेशनल सफलताओं के बावजूद, लंदन स्थित रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट (RUSI) के विश्लेषकों का कहना है कि भारत के लिए S-400 यूनिट का विस्तार करना कई चुनौतियों का सामना कर सकता है।
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