बिलासपुर, 17 जुलाई : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पति-पत्नी के बीच विवाद की स्थिति में पत्नी के मोबाइल की कॉल डिटेल और सीडीआर मांगने वाली पति की याचिका खारिज कर दी है। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि निजता एक संवैधानिक रूप से संरक्षित अधिकार है, जो मुख्य रूप से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी से उत्पन्न होता है। इसमें व्यक्तिगत अंतरंगता, पारिवारिक जीवन की पवित्रता, विवाह, घर और यौन अभिविन्यास की सुरक्षा शामिल है। इस अधिकार में किसी भी तरह का अतिक्रमण या हस्तक्षेप व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा। मामले की सुनवाई जस्टिस राकेश मोहन पांडे की अदालत में हुई।
पूरा मामला क्या है?
दुर्ग जिले के निवासी याचिकाकर्ता ने 4 जुलाई 2022 को राजनांदगांव जिले की एक युवती से हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(i) के तहत अपनी पत्नी से तलाक की मांग करते हुए याचिका दायर की। आरोप है कि शादी के 15 दिन बाद ही पत्नी अपने माता-पिता के घर चली गई और उसके कुछ ही समय बाद उसका व्यवहार काफी बदल गया। यह भी आरोप लगाया गया कि पत्नी ने याचिकाकर्ता की माँ और भाई के साथ भी दुर्व्यवहार किया।
तलाक के लिए याचिका दायर
याचिका में कहा गया है कि सितंबर और अक्टूबर के महीनों में पत्नी फिर अपने माता-पिता के घर चली गई और जब पति ने उसे वापस लाने के लिए कहा, तो उसने आने से इनकार कर दिया। इसके बाद, याचिकाकर्ता ने 7 अक्टूबर 2022 को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए याचिका दायर की। इसके बाद, पत्नी ने धारा 125 के तहत एक आवेदन दायर किया। पत्नी ने अपने पति के माता, पिता और भाई के खिलाफ घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत कार्यवाही भी शुरू की।
कॉल डिटेल मांगने कोर्ट पहुंचे
इसके बाद पति ने 24 जनवरी 2024 को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, दुर्ग के समक्ष एक आवेदन दायर किया। इसमें उसने अपनी पत्नी की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) उपलब्ध कराने की मांग की, लेकिन पुलिस ने इनकार कर दिया। जब पुलिस ने सीडीआर उपलब्ध नहीं कराई, तो पति अपनी मांग लेकर अदालत गया। जब पारिवारिक न्यायालय ने आवेदन खारिज कर दिया, तो उसने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की।
अदालत ने क्या कहा?
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मौजूदा मामले के तथ्यों से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता द्वारा तलाक के लिए दायर याचिका में व्यभिचार का कोई आरोप नहीं है। अपने घर या दफ्तर की निजता में बिना किसी दखल के मोबाइल पर बात करने का अधिकार निश्चित रूप से निजता के अधिकार के तहत सुरक्षित है। यह हमारे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत पति और पत्नी दोनों का मौलिक अधिकार है। इसका मतलब है कि न तो पति और न ही पत्नी मनमाने ढंग से दूसरे के निजी स्थान, स्वायत्तता और संचार का उल्लंघन कर सकते हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि वैवाहिक संबंधों में साथ रहना शामिल है, लेकिन इससे निजी निजता के अधिकार का हनन नहीं होता। पति अपनी पत्नी को उसके मोबाइल फोन या बैंक खाते के पासवर्ड साझा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता और ऐसा करना निजता का हनन और संभावित घरेलू हिंसा माना जाएगा। अदालत ने याचिका खारिज कर दी।
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