नई दिल्ली, 21 जनवरी : अरावली पर्वत की परिभाषा को लेकर जारी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि यह मुद्दा सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि देश के पर्यावरणीय भविष्य से जुड़ा हुआ है। अदालत ने साफ निर्देश दिए कि अरावली क्षेत्र में किसी भी तरह का अवैध खनन बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, क्योंकि ऐसे खनन के परिणाम अपूरणीय और दूरगामी होते हैं।
शीर्ष अदालत ने यह भी दोहराया कि अरावली की वैज्ञानिक और स्पष्ट परिभाषा तय करने के लिए एक हाई-पावर्ड कमेटी का गठन किया जाएगा। इस समिति में पर्यावरण, वन, भू-विज्ञान और संबंधित क्षेत्रों के निष्पक्ष विशेषज्ञ शामिल होंगे। अदालत ने सभी पक्षों, जिनमें एमिकस क्यूरी भी शामिल हैं, को चार सप्ताह के भीतर समिति के संभावित सदस्यों के नाम और सुझाव प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
रोक को बढ़ाया गया
अदालत ने अपने उस पुराने फैसले पर लगी रोक को भी आगे बढ़ा दिया है, जिसमें 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली मानने की सिफारिश की गई थी। पर्यावरण मंत्रालय की समिति की इस सिफारिश को अदालत पहले ही पुनर्विचार योग्य बताते हुए स्थगित कर चुकी है। अदालत का मानना है कि यह मामला अत्यंत संवेदनशील है और इसे जल्दबाजी में तय नहीं किया जा सकता। इसलिए नई विशेषज्ञ समिति तथ्यात्मक और वैज्ञानिक आधार पर नई परिभाषा की सिफारिश करेगी।
सुनवाई के दौरान एक वकील ने राजस्थान के कई क्षेत्रों में लगातार हो रहे अवैध खनन का मुद्दा उठाया।
गहराई से होगी जांच
इस पर अदालत ने राजस्थान सरकार के वकील को तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया और कहा कि अरावली जैसा पर्यावरणीय क्षेत्र किसी भी तरह का दबाव नहीं झेल सकता। अदालत ने यह भी कहा कि अवैध खनन भविष्य की पीढ़ियों के पर्यावरणीय अधिकारों को सीधे प्रभावित करता है, इसलिए अदालत इस पूरे मामले के सभी पहलुओं की गहराई से जांच करेगी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि पिछले वर्ष दिसंबर में पारित अंतरिम आदेश अगले आदेश तक लागू रहेगा। साथ ही, हस्तक्षेप करने वाले पक्षों को निर्देश दिया गया है कि वे एमिकस क्यूरी से संपर्क कर अपनी टिप्पणियां और रिपोर्ट प्रस्तुत करें।

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