चंडीगढ़, 25 फरवरी : पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने डेरा निर्मल कुटिया, जौहलां (जिला लुधियाना) से जुड़े बहुचर्चित विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि डेरा की संपत्ति किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वरूप वाली धार्मिक संस्था की संपत्ति है। न्यायमूर्ति Virender Aggarwal ने यह आदेश पारित करते हुए अपीलीय अदालत के उस निर्देश को बरकरार रखा, जिसमें डेरा प्रमुख बाबा जीत सिंह को आय, व्यय और संपत्तियों का पूरा लेखा-जोखा पेश करने के लिए कहा गया था।
ट्रस्टी की भूमिका, मालिकाना हक नहीं
अदालत ने कहा कि डेरा एक सार्वजनिक धार्मिक संस्था है और उसकी संपत्तियां साधुओं व श्रद्धालुओं के हित में हैं। ऐसे में डेरा प्रमुख अधिकतम एक ट्रस्टी के रूप में कार्य कर सकता है, न कि व्यक्तिगत मालिक के तौर पर। संत जसपाल सिंह और बाबा जीत सिंह द्वारा दायर दो समीक्षा याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए अदालत ने संत की याचिका स्वीकार कर ली और बाबा की समीक्षा याचिका खारिज कर दी।
फंड के दुरुपयोग के आरोप
याचिका में आरोप लगाया गया कि डेरा फंड से लग्जरी गाड़ियां खरीदी गईं, जिनमें जून 2021 में मर्सिडीज-बेंज, 2005 में एक अन्य मर्सिडीज और अगस्त 2017 में टोयोटा लैंड क्रूजर शामिल हैं। आरोप यह भी है कि डेरा फंड का इस्तेमाल निजी सुरक्षा कर्मियों और अन्य व्यक्तिगत खर्चों पर किया गया। संत जसपाल सिंह ने बाबा को पद से हटाने और संपत्तियों के हस्तांतरण पर रोक लगाने के लिए स्थायी आदेश की मांग की थी। वहीं, बाबा जीत सिंह ने दस्तावेजों की मांग को ‘फिशिंग इंक्वायरी’ बताया।
दस्तावेजों का खुलासा जरूरी
हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि निचली अदालत द्वारा आय, व्यय, दान, बैंक खातों और संपत्तियों से जुड़े रिकॉर्ड तलब करने से इनकार करना गलत था। ये दस्तावेज विवाद के समाधान के लिए केंद्रीय महत्व रखते हैं। हालांकि, अदालत ने रिसीवर नियुक्त करने की मांग को खारिज करने वाले अपीलीय आदेश को बरकरार रखा, लेकिन खातों के खुलासे को अनिवार्य बताया। यह फैसला धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों के प्रबंधन और पारदर्शिता के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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