April 25, 2026

राघव चड्ढा नहीं, संदीप पाठक की विदाई से AAP में बड़ी हलचल

राघव चड्ढा नहीं, संदीप पाठक की विदाई से...

चंडीगढ़, 25 अप्रैल : आम आदमी पार्टी (AAP) में संभावित बदलावों और नेताओं के बाहर जाने की चर्चाओं के बीच राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। पार्टी के अंदर माना जा रहा है कि यदि राघव चड्ढा और संदीप पाठक जैसे प्रमुख चेहरे किसी अन्य दल की ओर रुख करते हैं, तो इसका असर अलग-अलग स्तर पर पड़ेगा, लेकिन सबसे बड़ा झटका संगठनात्मक रणनीति के मोर्चे पर संदीप पाठक के जाने से लगेगा।

चड्ढा का संगठन पर सीमित असर

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, राघव चड्ढा को अधिकतर “ग्लैमर और मीडिया अपील” वाला चेहरा माना जाता है। उनके द्वारा 63 विधायकों के समर्थन के दावों को पार्टी नेतृत्व गंभीर खतरे के रूप में नहीं देख रहा है। AAP का मानना है कि इस तरह के दावे वास्तविक बड़े पैमाने पर टूट को नहीं दर्शाते। बल्कि इससे विधायकों को अपने-अपने क्षेत्रों में कुछ अधिक स्वतंत्रता मिल सकती है, जो पहले से ही कई स्तरों पर दबाव महसूस कर रहे थे।

“तीन स्तरीय नियंत्रण” से नाराजगी

पार्टी के कई विधायकों में लंबे समय से यह असंतोष देखा जा रहा है कि उनके हलकों में तीन स्तरों का नियंत्रण काम करता है विधायक स्वयं, हलका इंचार्ज, केंद्रीय नेतृत्व से जुड़े संगठनात्मक प्रतिनिधि। इस व्यवस्था को लेकर कई विधायक निजी तौर पर “अत्यधिक नियंत्रण और दबाव” की शिकायत करते रहे हैं। पार्टी नेतृत्व को आशंका है कि विधायकों की नाराजगी को देखते हुए कुछ आंतरिक रणनीतियों में बदलाव करना पड़ सकता है, जिसमें मौजूदा विधायकों की बड़े पैमाने पर अदला-बदली की योजना भी शामिल हो सकती है। हालांकि, इसे फिलहाल दलबदल की स्थिति रोकने की एक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

संदीप पाठक: AAP के “रणनीतिक दिमाग”

BJP खेमे के लिए सबसे महत्वपूर्ण “इंपोर्ट” के रूप में संदीप पाठक का नाम सामने आ रहा है। पंजाब में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए उन्हें बेहद अहम माना जा रहा है। पाठक को वह व्यक्ति माना जाता है, जिन्होंने 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले AAP के संगठन को लगभग शून्य से खड़ा किया था। सूत्रों के मुताबिक, संदीप पाठक को पार्टी के संगठनात्मक ढांचे की गहरी समझ है। अब यदि वह विपक्षी खेमे में जाते हैं, तो आशंका है कि वही संरचना BJP के चुनावी अभियान को मजबूत करने में इस्तेमाल हो सकती है।

पंजाब की राजनीति में यह संभावित घटनाक्रम AAP के लिए संगठनात्मक चुनौती और BJP के लिए रणनीतिक अवसर दोनों के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि पार्टी अपने भीतर की असंतोष और संभावित टूट को कैसे संभालती है।

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