बीजिंग, 10 अप्रैल : चीन भले ही ईरान का एक बड़ा कूटनीतिक सहयोगी बना हुआ है, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में उसके बढ़ते आर्थिक निवेश के कारण राष्ट्रपति शी चिनफिंग का ईरान के प्रति समर्थन अब सीमित होता नजर आ रहा है। मध्य पूर्व में फैले व्यापक चीनी निवेश ने बीजिंग को अधिक संतुलित और सावधानीपूर्ण रुख अपनाने के लिए मजबूर किया है। कोविड-19 महामारी के बाद चीन ने मिडिल ईस्ट में अपने निवेश में तेजी से बढ़ोतरी की है।
आर्थिक मंदी से जूझ रही चीनी कंपनियों ने खाड़ी देशों में उभरते अवसरों का लाभ उठाया, जहां देश जीवाश्म ईंधन से हटकर ग्रीन टेक्नोलॉजी और पर्यटन जैसे क्षेत्रों में विविधता ला रहे हैं। इन क्षेत्रों में चीन की मजबूत पकड़ ने उसे प्रमुख निवेशक बना दिया है।
‘बेल्ट एंड रोड’ का अहम केंद्र बना क्षेत्र
मिडिल ईस्ट अब चीन की प्रमुख परियोजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। हाल के वर्षों में यहां चीनी निवेश और निर्माण कार्यों में तेजी आई है, जिससे क्षेत्र में चीन का प्रभाव बढ़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, चीन अब क्षेत्रीय वित्तपोषक के रूप में अमेरिका से आगे निकल रहा है। AidData के मुताबिक, 2014 से 2023 के बीच चीन ने खाड़ी देशों को अमेरिका के मुकाबले हर 1 डॉलर पर लगभग 2.34 डॉलर का निवेश दिया है।
युद्ध से बढ़ा जोखिम
इसके अलावा, अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के ‘चाइना ग्लोबल इनवेस्टमेंट ट्रैकर’ के अनुसार, चीन ने पिछले दो दशकों में करीब 270 अरब डॉलर के प्रोजेक्ट खड़े किए हैं। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव ने वैश्विक बाजारों को प्रभावित किया है। इस संघर्ष से चीन की उस स्थिरता को खतरा पैदा हो गया है, जिस पर वह अपने आर्थिक विस्तार के लिए निर्भर था।
निशाने पर चीनी प्रोजेक्ट
खाड़ी क्षेत्र में चीनी परियोजनाएं अब खतरे में हैं। रिपोर्ट के अनुसार, दुबई, कतर और ओमान में चीन द्वारा वित्तपोषित कम से कम तीन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर हमले हो चुके हैं।
इसके अलावा 12 अन्य प्रोजेक्ट उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में हैं, जिनमें लगभग 4.66 अरब डॉलर का निवेश दांव पर लगा हुआ है। संघर्ष शुरू होने से पहले संयुक्त अरब अमीरात में करीब 3.7 लाख चीनी नागरिक रह रहे थे। हालांकि अब तक 10,000 से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है, लेकिन बड़ी संख्या में नागरिक अभी भी वहां मौजूद हैं।
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