नई दिल्ली, 14 अगस्त : भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर दुवुरी सुब्बाराव ने चेतावनी दी है कि डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय निर्यात पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने के प्रस्ताव और भारतीय बाज़ारों में चीनी डंपिंग के जोखिम के कारण भारत दोहरे दबाव में है। एक मीडिया हाउस को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि ये संयुक्त दबाव विनिर्माण क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता को कमज़ोर कर सकते हैं। जी.डी.पी. की वृद्धि दर में 50 आधार अंकों की गिरावट आ सकती है और देश की बेरोज़गारी वृद्धि की चुनौती और भी बदतर हो सकती है।
2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान भारत का नेतृत्व करने वाले डी. सुब्बाराव ने कहा कि अमेरिकी टैरिफ भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 2 प्रतिशत (लगभग 79 अरब डॉलर या 7 लाख करोड़ रुपये) मूल्य के निर्यात के लिए ख़तरा हैं। उन्होंने कहा कि इससे मार्जिन कम होगा, ऑर्डर दूसरी जगह भेजे जाएँगे, नौकरियाँ जाएँगी और संयंत्रों का आकार छोटा किया जाएगा। उन्होंने अनुमान लगाया कि विकास दर पर इसका प्रभाव 20-50 आधार अंकों का होगा, जो इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत इस झटके का प्रबंधन कितनी अच्छी तरह करता है या उसे दूसरी जगह भेजता है।
चीन से बड़ा खतरा होगा
उन्होंने चेतावनी दी कि बीजिंग की औद्योगिक क्षमता एक अतिरिक्त जोखिम पैदा करती है। चूँकि चीन को अमेरिका से टैरिफ संबंधी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है, इसलिए चीनी निर्यातक अधिशेष उत्पाद बेचने के लिए भारत का रुख कर सकते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि हमें अमेरिकी बाजार में अपनी हिस्सेदारी में आई कमी की भरपाई के लिए चीन द्वारा हमारे बाजारों में डंपिंग की संभावना पर भी विचार करना होगा।
सुब्बाराव के अनुसार, अमेरिकी टैरिफ और चीनी डंपिंग का दोहरा दबाव चीन+1 रणनीति के तहत वैश्विक मूल्य श्रृंखला में शामिल होने के भारत के प्रयासों को कमजोर कर सकता है। उन्होंने आगे कहा कि वितरण संबंधी प्रभाव प्रतिकूल होंगे, आय असमानता को बढ़ाएँगे और पारंपरिक रोज़गार बाज़ार पर दबाव डालेंगे।
अमेरिकी टिप्पणियों से प्रतिष्ठा खतरे में
सुब्बाराव ने ट्रंप द्वारा भारत को ‘रूस की तरह मृत’ कहे जाने से होने वाले संभावित प्रतिष्ठागत नुकसान की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि एक अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा भारत को ‘मृत’ अर्थव्यवस्था कहना भारत की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने वाला है।
उन्होंने कहा कि ऐसी टिप्पणियों से भारत का जोखिम प्रीमियम बढ़ सकता है, निवेशक भावना प्रभावित हो सकती है तथा प्रत्यक्ष नीतिगत कार्रवाई के बिना भी पोर्टफोलियो पुनर्आबंटन को बढ़ावा मिल सकता है।
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