नई दिल्ली, 27 जून : एक समय में छत्तीसगढ़, बंगाल, ओडिशा, झारखंड, मध्य प्रदेश, आंध्र, तेलंगाना और महाराष्ट्र के बड़े हिस्से पर माओवादी सोच का प्रभाव था। जब मोदी सरकार सत्ता में आई थी, तब देश के करीब एक चौथाई जिलों में लाल आतंकवाद फैला था। अब माओवादी अपनी जमीन खो रहे हैं, वे आत्मसमर्पण कर रहे हैं और सामाजिक मुख्यधारा में लौट रहे हैं, लेकिन राजनीतिक भाषा में माओवाद की गूंज सुनाई देती रहती है। माओवादी, जिन्हें पहले नक्सलवादी कहा जाता था, अभी पूरी तरह से पराजित नहीं हुए हैं। उनसे वैचारिक स्तर पर भी लडऩे की जरूरत है।
तीन महीने बाद दिसंबर में आरएसएस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई। सौ साल के सफर में कम्युनिस्ट आंदोलन कमजोर होता गया जबकि संघ मजबूत होता गया। सशस्त्र तथाकथित कम्युनिस्ट क्रांति की शुरुआत तो आंध्र प्रदेश में ही हो गई थी, लेकिन 1970 के दशक की शुरुआत में बंगाल के नक्सलबाड़ी से इसे गति मिली।
चीनी कम्युनिस्ट नेता माओत्से तुंग कहते थे कि सत्ता बारूद से आती है। नक्सलवादी आंदोलन ने दो तरह से अपना प्रभाव बढ़ाया। एक तरफ जहां इस विचारधारा ने शिक्षण संस्थानों और वैचारिक संस्थाओं में बौद्धिक जड़ें जमा लीं, वहीं दूसरी तरफ खेतों और जंगलों में खूनी क्रांति के सपने को पूरा करने के लिए युवा हाथों ने हथियार उठा लिए। धीरे-धीरे इस विचार का वैचारिक प्रभाव न केवल वैचारिक संस्थाओं में बढ़ा, बल्कि जंगलों, पिछड़े और आदिवासी इलाकों में भी सशस्त्र संगठनों का प्रभाव बढ़ा।

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