नई दिल्ली, 2 अक्तूबर : शिक्षकों ने टीईटी अनिवार्य करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया है। शिक्षकों ने सरकार पर राहत के लिए दबाव बनाने के साथ-साथ आदेश पर पुनर्विचार की भी अपील की है। शिक्षक संघ के अलावा, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की है।
तमिलनाडु सरकार का कहना है कि टीईटी अनिवार्यता केवल उन्हीं शिक्षकों पर लागू है जिनकी नियुक्ति आरटीई कानून लागू होने के बाद हुई है। यह अनिवार्यता उन शिक्षकों पर लागू नहीं होती जिनकी नियुक्ति इस कानून के लागू होने से पहले हुई थी।
फैसले से 10 लाख शिक्षक प्रभावित हो रहे हैं
सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर के अपने आदेश में कक्षा 1 से कक्षा 8 तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों (जिनका कार्यकाल पांच साल से अधिक है) के लिए दो साल के भीतर टीईटी पास करना अनिवार्य कर दिया है। पांच साल से कम कार्यकाल वाले शिक्षकों के लिए, अगर वे पदोन्नति पाना चाहते हैं तो टीईटी अनिवार्य है। इस आदेश का सबसे ज्यादा असर आरटीई कानून लागू होने से पहले हुई नियुक्तियों पर पड़ रहा है।
अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ ने सुप्रीम कोर्ट से टीईटी अनिवार्य करने के आदेश पर पुनर्विचार करने की अपील करते हुए कहा कि इस फैसले से देश भर के करीब 10 लाख शिक्षक प्रभावित हो रहे हैं। इन शिक्षकों की नियुक्ति शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून लागू होने से पहले के नियमों के अनुसार हुई थी। नियुक्ति के समय उन शिक्षकों के लिए टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) अनिवार्य नहीं थी और अब उनमें से ज्यादातर की उम्र 50 साल से अधिक है।
संघ का कहना है कि पूर्वव्यापी प्रभाव से टीईटी अनिवार्य करने से बड़ी संख्या में शिक्षक बर्खास्त होंगे, उन्हें पदोन्नति नहीं मिलेगी और उनके जीने का अधिकार प्रभावित होगा।
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