नई दिल्ली, 6 जनवरी : देश की सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) को चार महीने के भीतर वेतन सीमा में संशोधन पर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी जिसमें दावा किया गया था कि वेतन सीमा पर रोक के कारण कई कर्मचारी ईपीएफओ के दायरे से बाहर हो गए हैं।यह याचिका डॉ. नवीन प्रकाश नौटियाल द्वारा दायर की गई थी। न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने याचिका पर सुनवाई की। न्यायालय ने याचिकाकर्ता को आदेश की प्रति सहित विस्तृत अभ्यावेदन प्रस्तुत करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया।
न्यूनतम वेतन 15,000 रुपये प्रति माह निर्धारित किया गया है।
केंद्र सरकार ने न्यूनतम मजदूरी 15,000 रुपये प्रति माह निर्धारित की है। सितंबर 2014 से इस सीमा में कोई बदलाव नहीं किया गया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि 15,000 रुपये प्रति माह की मजदूरी सीमा मनमानी और अतार्किक है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इसका मुद्रास्फीति, न्यूनतम मजदूरी या प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि से कोई संबंध नहीं है।
याचिका में कहा गया है कि 15,000 रुपये प्रति माह से थोड़ा अधिक कमाने वाले कर्मचारियों को भी ईपीएफ के दायरे से बाहर रखा गया है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि छठी लोकसभा की लोक लेखा समिति ने अपनी 34वीं रिपोर्ट में कहा था कि यदि निचले स्तर के कर्मचारियों को कल्याणकारी योजनाओं में शामिल नहीं किया जाता है, तो सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है।
समिति ने मुद्रास्फीति के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए हर तीन से पांच साल में वेतनमान में आवधिक संशोधन की भी सिफारिश की। इन सिफारिशों को जुलाई 2022 में केंद्रीय न्यासी बोर्ड द्वारा अनुमोदित किया गया था, लेकिन केंद्र सरकार ने अभी तक इन पर कोई निर्णय नहीं लिया है।

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