इस्लामाबाद, 13 अप्रैल : पाकिस्तान ने ‘इस्लामाबाद वार्ता’ के निष्कर्षहीन रहने के बावजूद साफ किया है कि वह अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की भूमिका जारी रखेगा। विदेश मंत्री इशाक डार ने उम्मीद जताई कि दोनों देश युद्धविराम के प्रति प्रतिबद्ध रहेंगे। इशाक डार ने बताया कि उन्होंने सेना प्रमुख आसिम मुनीर के साथ मिलकर कई दौर की “कठिन लेकिन सकारात्मक” वार्ताओं में अहम भूमिका निभाई। अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने भी पाकिस्तान की मेजबानी और प्रयासों की सराहना की।
क्या मिला पाकिस्तान को फायदा?
कई विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रक्रिया ने पाकिस्तान की वैश्विक छवि को मजबूत किया है। दो विरोधी देशों को बातचीत की मेज पर लाना एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि माना जा रहा है, खासकर तब जब 1979 के बाद दोनों के बीच सीधा संवाद लगभग न के बराबर रहा है। डॉ. फारूक हसनात का कहना है कि इस तरह की वार्ताओं को पूरी तरह विफल नहीं कहा जा सकता। उनके अनुसार दोनों पक्षों ने बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई है, कई मुद्दों पर सहमति बनी है, मतभेद केवल कुछ अहम बिंदुओं पर हैं।
निराशा भी, उम्मीद भी
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बक़ाई ने भी माना कि बातचीत “अविश्वास के माहौल” में शुरू हुई थी, इसलिए एक ही बैठक में समझौता होना मुश्किल था। हालांकि अंतिम समझौता न होने से इस्लामाबाद में निराशा का माहौल है, लेकिन बातचीत जारी रहने की सहमति को सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। यदि क्षेत्र में तनाव फिर बढ़ता है, तो पाकिस्तान के लिए संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा। फिर भी, खुद को एक तटस्थ मध्यस्थ के रूप में स्थापित करना उसकी बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि मानी जा रही है।
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