नई दिल्ली, 25 मार्च : ओवरथिंकिंग यानी किसी भी छोटी-बड़ी बात को जरूरत से ज्यादा सोचना। यह सिर्फ आदत नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है, जिसमें व्यक्ति समस्या का हल ढूंढने के बजाय उसी में उलझता चला जाता है।
दिमाग में क्या होता है?
विशेषज्ञों के अनुसार ओवरथिंकिंग का सीधा संबंध चिंता (एंग्जायटी) से होता है। इसमें दिमाग के दो हिस्सों—Amygdala (डर और खतरे को महसूस करने वाला भाग) और Prefrontal Cortex (तर्क और फैसले लेने वाला भाग)—के बीच संतुलन बिगड़ जाता है। यही कारण है कि व्यक्ति सही निर्णय नहीं ले पाता।
ओवरथिंकिंग के मुख्य कारण
- अनिश्चितता का डर
इंसानी दिमाग हर चीज को कंट्रोल में रखना चाहता है। जब स्थिति अनिश्चित होती है, तो दिमाग बार-बार नकारात्मक संभावनाएं सोचने लगता है। - रुमिनेशन (एक ही बात को दोहराना)
इसे Rumination कहा जाता है—जहां व्यक्ति अतीत की गलतियों या भविष्य की चिंताओं में फंसा रहता है। - अधिक संवेदनशील सोच
कुछ लोग हर बात को बहुत गहराई से सोचते हैं और हर चीज के पीछे छिपे मतलब निकालने की कोशिश करते हैं, जिससे ओवरथिंकिंग बढ़ती है।
क्या इसे रोका जा सकता है?
पूरी तरह खत्म करना मुश्किल है, लेकिन इसे कंट्रोल किया जा सकता है।
- जागरूकता बढ़ाएं
पहचानें कि आप कब बेवजह सोच के चक्र में फंस रहे हैं। - दूरी बनाना सीखें
हर बात पर प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं। कुछ चीजों को नजरअंदाज करना भी सीखें। - वर्तमान में रहें
Mindfulness यानी वर्तमान पल पर ध्यान केंद्रित करना ओवरथिंकिंग से बाहर निकलने का असरदार तरीका है।
ओवरथिंकिंग दिमाग का एक ऐसा जाल है, जिसमें फंसना आसान है लेकिन समझदारी और सही अभ्यास से इससे बाहर निकला जा सकता है।

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