बर्लिन, 23 अप्रैल : भारत और Germany ने अपने रणनीतिक और सैन्य संबंधों को मजबूत करते हुए एक महत्वाकांक्षी ‘डिफेंस इंडस्ट्रियल रोडमैप’ पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते को Berlin में हुई उच्च स्तरीय बैठक के बाद अंतिम रूप दिया गया। भारत के रक्षा मंत्री Rajnath Singh और जर्मनी के रक्षा मंत्री Boris Pistorius के बीच हुई बैठक के बाद इस महत्वपूर्ण दस्तावेज पर सहमति बनी। यह समझौता रक्षा सहयोग को नई दिशा देगा।
दोतरफा फायदे वाला समझौता
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यह रोडमैप ‘टू-वे स्ट्रीट’ के रूप में तैयार किया गया है। अब तक भारत मुख्य रूप से रक्षा उपकरणों का खरीदार रहा है, लेकिन इस नए ढांचे के तहत भारतीय कंपनियां जर्मनी के रक्षा बाजार में भी प्रवेश कर सकेंगी और वहां के अनुबंधों के लिए बोली लगा सकेंगी। यह समझौता भारत की घरेलू रक्षा निर्माण क्षमता को मजबूत करेगा। जर्मनी की उन्नत इंजीनियरिंग और भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता मिलकर नए तकनीकी नवाचारों को बढ़ावा देंगी। विशेष रूप से ‘नीश टेक्नोलॉजी’ यानी उच्च-तकनीकी क्षेत्रों पर फोकस किया जाएगा।
पनडुब्बी कार्यक्रम को बड़ी गति
इस रोडमैप का सबसे बड़ा असर Project-75I पर पड़ेगा। भारत और जर्मनी मिलकर 6 अगली पीढ़ी की पनडुब्बियों के सह-निर्माण के करीब पहुंच चुके हैं। करीब 8 अरब डॉलर (लगभग 66,000 करोड़ रुपये) का यह प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना की ताकत को कई गुना बढ़ा देगा। जर्मन कंपनी Thyssenkrupp Marine Systems (TKMS) ने भारत की Mazagon Dock Shipbuilders Limited (MDL) के साथ इस प्रोजेक्ट के लिए साझेदारी की है।
पिछले साल जून में हुए समझौते के बाद अब यह रोडमैप औपचारिक अनुबंध का रास्ता साफ कर रहा है।
AIP तकनीक से बढ़ेगी पनडुब्बियों की ताकत
इस सौदे का सबसे अहम हिस्सा ‘एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन’ (AIP) तकनीक है। यह तकनीक पनडुब्बियों को लंबे समय तक पानी के भीतर रहने में सक्षम बनाती है, जिससे उन्हें बार-बार सतह पर आने की जरूरत नहीं पड़ती और दुश्मन के रडार से बचाव संभव होता है। यह समझौता भारत को केवल खरीदार से निर्माता और निर्यातक बनने की दिशा में आगे बढ़ाएगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह डील आने वाले वर्षों में भारत की रक्षा नीति के लिए ‘गेम-चेंजर’ साबित हो सकती है।
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