नई दिल्ली, 31 दिसम्बर : भारत ने इस साल चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बनने का गौरव हासिल कर लिया है। हालांकि इस उपलब्धि की कीमत पंजाब और हरियाणा जैसे चावल उत्पादक राज्यों को जल संकट का सामना करके चुकानी पड़ रही है। देश के सियासतदाँ और कृषि लाब्बी इस उपलब्धि का जश्न मना रहे हैं, लेकिन कई छोटे और मझोले किसान इस सफलता से खुश नहीं हैं।
पिछले दशक में भारत ने चावल की निर्यात मात्रा लगभग दोगुनी कर दी है, और पिछले वित्तीय वर्ष में यह दो करोड़ मीट्रिक टन से अधिक हो गई। किसानों, सरकारी अधिकारियों और कृषि वैज्ञानिकों के साथ की गई इंटरव्यू और ज़मीन के नीचे के पानी के आंकड़ों की समीक्षा से पता चला है कि चावल जैसी अधिक पानी की मांग वाली फसल देश के पहले से घटते जल भंडार को असहज तरीके से समाप्त कर रही है।
पानी का स्तर लगातार घट रहा
हरियाणा और पंजाब जैसे चावल उत्पादक राज्यों में 50 किसानों और आठ जल तथा कृषि अधिकारियों के अनुसार, दस साल पहले जमीन का पानी लगभग 30 फीट गहराई पर मिल जाता था। लेकिन पिछले पांच वर्षों में पानी का स्तर तेजी से गिरा है और अब बोरवेल 80 से 200 फीट तक गहरे करने पड़ रहे हैं।
पंजाब के 76 वर्षीय किसान सुखविंदर सिंह ने बताया, “पिछली गर्मियों में मैंने 30-40 हजार रुपये खर्च किए ताकि मैं घटते पानी के बावजूद चावल की खेती जारी रख सकूं। अगर यह स्थिति जारी रही तो खर्च बहुत बढ़ जाएंगे।”
फसल चक्र बदलने का सुझाव
किसान गुरमीत सिंह ने कहा कि अगर सरकार किसानों को उचित तरीके से प्रोत्साहित करे तो वे फसल चक्र बदलने के लिए तैयार हैं। हरियाणा के 50 वर्षीय किसान बलकार सिंह ने कहा, “हर साल बोरवेल और गहरा करना पड़ता है। यह बहुत महंगा होता जा रहा है।”
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