नई दिल्ली, 19 जनवरी : सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पशु अधिकारों के लिए काम करने वाली कार्यकर्ता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी पर कड़ी टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने एक पॉडकास्ट में आवारा कुत्तों को लेकर अदालत की टिप्पणियों पर मेनका गांधी की प्रतिक्रिया, उनके बयानों और ‘बॉडी लैंग्वेज’ पर गंभीर सवाल उठाए।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि यह अदालत की महानता है कि उसने इस मामले में अवमानना (Contempt) की कार्रवाई नहीं की। पीठ ने साफ किया कि जब अदालत ने यह कहा था कि आवारा कुत्तों के हमलों के लिए उन्हें खाना खिलाने वाले लोग जिम्मेदार हो सकते हैं, तो वह टिप्पणी पूरी तरह गंभीर थी, न कि मजाक में कही गई।
वकील से पूछा: क्या आपने अपनी क्लाइंट का पॉडकास्ट देखा है?
अदालत ने मेनका गांधी के वकील राजू रामचंद्रन से कहा,
“आप हमें सावधान रहने की नसीहत दे रहे हैं, लेकिन क्या आपने देखा है कि आपकी क्लाइंट किस तरह की टिप्पणियां कर रही हैं? क्या आपने उनका पॉडकास्ट सुना है? उनकी बॉडी लैंग्वेज देखी है? वह क्या कहती हैं और किस अंदाज में कहती हैं?”
पीठ ने आगे कहा कि अदालत पर टिप्पणी करने से पहले सार्वजनिक मंचों पर दिए जा रहे बयानों की जिम्मेदारी समझनी चाहिए।
आवारा कुत्तों के हमलों पर अदालत का सख्त रुख
अदालत ने दोहराया कि आवारा कुत्तों के हमलों की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। जब वकील रामचंद्रन ने रेबीज कंट्रोल, वैक्सीन और व्यवस्था की क्षमता की बात उठाई, तो पीठ ने सवाल किया कि एक पूर्व कैबिनेट मंत्री और पशु अधिकार कार्यकर्ता होने के नाते इन योजनाओं के लिए बजट और क्रियान्वयन में मेनका गांधी का क्या योगदान रहा है।
‘अगर प्यार है तो घर ले जाइए’
पिछली सुनवाई का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा था कि वह राज्यों को आवारा कुत्तों के हमलों में बच्चों और बुजुर्गों की मौत या चोट के मामलों में भारी मुआवजा देने का निर्देश दे सकती है। अदालत ने तीखा सवाल किया,
“अगर आपको इन जानवरों से इतना प्यार है, तो उन्हें अपने घर क्यों नहीं ले जाते? वे सड़कों पर क्यों घूमते रहें और लोगों को क्यों काटें?”
सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों के बाद आवारा कुत्तों के मुद्दे पर बहस और तेज हो गई है।

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