April 7, 2026

पी.आर.टी.सी. के 15 जून 1992 के बाद रैगुलर स्टाफ को मिलेगा जी.पी.एफ का लाभ

पी.आर.टी.सी. के 15 जून 1992 के बाद रैगुलर...

चंडीगढ़, 18 फरवरी : पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने पेप्सू रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (पीआरटीसी) के कर्मचारियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि 15 जून 1992 के बाद नियमित (रेगुलर) किए गए कर्मचारियों को जनरल प्रोविडेंट फंड (जीपीएफ) पेंशन स्कीम का लाभ स्वतः मिलेगा। इसके लिए किसी अलग विकल्प (ऑप्शन) भरने की आवश्यकता नहीं होगी। अदालत ने 19 अक्तूबर 2021 के उस पत्र को रद्द कर दिया, जिसमें पेंशन लाभ से इनकार किया गया था, और कर्मचारी को जीपीएफ स्कीम का सदस्य मानने का निर्देश दिया।

‘मौजूदा’ और ‘नए नियमित’ कर्मचारियों पर स्पष्टता

मामले की सुनवाई जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ की एकल पीठ कर रही थी। विवाद इस बात को लेकर था कि 15 जून 1992 से पहले एडहॉक आधार पर नियुक्त लेकिन बाद में नियमित किए गए कर्मचारियों को ‘मौजूदा कर्मचारी’ माना जाए या ‘नए नियमित कर्मचारी’। कॉरपोरेशन ने दलील दी थी कि ऐसे कर्मचारियों को पेंशन स्कीम का लाभ लेने के लिए निर्धारित समय सीमा के भीतर विकल्प भरना जरूरी था, जबकि याचिकाकर्ता ने स्वयं को इस लाभ का हकदार बताया था।

एडहॉक कर्मचारी ‘मौजूदा’ श्रेणी में नहीं

अदालत ने 1992 के नियमों की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि ‘नियम लागू होने से ठीक पहले कार्यरत कर्मचारी’ से आशय केवल उन कर्मचारियों से है जो उस समय पूर्णकालिक और नियमित आधार पर सेवा में थे।

कोर्ट ने कहा कि एडहॉक, वर्क-चार्ज या अनुबंध आधार पर नियुक्त कर्मचारियों को इस श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता। इसलिए 15 जून 1992 के बाद नियमित किए गए कर्मचारियों को ‘नए नियमित कर्मचारी’ माना जाएगा और वे स्वतः पेंशन स्कीम के अंतर्गत आएंगे।

अलग विकल्प की शर्त नियमों के विपरीत

पीठ ने यह भी कहा कि 15 जून 1992 के बाद नियमित किए गए कर्मचारियों से अलग विकल्प भरने की अपेक्षा करना नियमों की भावना के विपरीत है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि समान परिस्थितियों में कई अन्य कर्मचारियों को पहले ही पेंशन स्कीम का लाभ दिया जा चुका है। ऐसे में याचिकाकर्ता को इससे वंचित करना पक्षपातपूर्ण है।

अपने अंतिम आदेश में अदालत ने कॉरपोरेशन को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को सभी पेंशन लाभ प्रदान किए जाएं और उसे जीपीएफ पेंशन स्कीम का सदस्य माना जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि कर्मचारी तीन महीने के भीतर नियोक्ता द्वारा जमा कराई गई कंट्रीब्यूटरी प्रोविडेंट फंड (सीपीएफ) की राशि वापस करेगा, लेकिन निगम उस राशि पर किसी प्रकार का ब्याज दावा नहीं कर सकेगा।

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