चंडीगढ़, 3 अप्रैल : पंजाब में भूजल संरक्षण और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के लिए बड़ा नीति बदलाव सुझाया गया है। विशेषज्ञों ने कहा है कि खेती क्षेत्र को मुफ्त बिजली देने के बजाय किसानों को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से सीधे कैश इंसेंटिव दिया जाना चाहिए, जिससे पानी के अत्यधिक दोहन पर रोक लग सके। चंडीगढ़ सिटीज़न्स फाउंडेशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में नीति निर्माताओं, शिक्षाविदों और कृषि विशेषज्ञों ने कहा कि मौजूदा कृषि मॉडल पंजाब के जल संसाधनों पर भारी दबाव डाल रहा है। मुफ्त बिजली के कारण किसान अधिक पानी वाली फसलों की ओर झुक रहे हैं।
फसली विविधता और कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग पर जोर
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि फसली विविधता को बढ़ावा देने के लिए कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को अपनाना जरूरी है। पुराने उपाय पर्याप्त नहीं हैं, इसलिए किसानों को नकदी फसलों और फसली चक्र में संतुलन बनाना होगा। नीति आयोग के सदस्य डॉ. रमेश चंद ने कहा कि अब तक फसली विविधता के प्रयासों के संतोषजनक परिणाम नहीं मिले हैं। उन्होंने किसानों से धान-गेहूं के पारंपरिक चक्र से बाहर निकलकर सरसों, कपास और मक्का जैसी फसलों की ओर बढ़ने की अपील की।
बागवानी और उच्च मूल्य वाली फसलों में संभावनाएं
विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों को बेहतर आय के लिए बागवानी और उच्च मूल्य वाली फसलों की खेती करनी चाहिए। अगर अगले दशक में धान के रकबे में 10% कमी लाई जाती है, तो कृषि क्षेत्र में 3.4% सालाना वृद्धि संभव है। मौसम परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं से बढ़ते खतरे को देखते हुए विशेषज्ञों ने फसल बीमा नीति लागू करने की मांग की। साथ ही हरियाणा की तर्ज पर पंजाब में ‘कीमत स्थिरता फंड’ स्थापित करने का सुझाव दिया गया।

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