नई दिल्ली, 4 मई : नेपाल ने उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे के जरिए प्रस्तावित कैलाश मानसरोवर यात्रा के मार्ग पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई है। नेपाल ने भारत और चीन दोनों के समक्ष कूटनीतिक विरोध जताते हुए दावा किया है कि लिपुलेख और आसपास के क्षेत्र उसकी सीमा में आते हैं। नेपाल की बालेन शाह सरकार ने अपने एक महीने से थोड़े ही ज्यादा कार्यकाल में एक साथ भारत और चीन दोनों से दो-दो हाथ करने का फैसला किया है। बालेन शाह की सरकार ने भारत और चीन की उस योजना पर आपत्ति जताई है जिसके तहत वे लिपुलेख दर्रे से होकर कैलाश मानसरोवर यात्रा आयोजित कर रहे हैं।
भारत का सख्त जवाब
भारतीय विदेश मंत्रालय ने नेपाल के दावों को एकतरफा और ‘बनावटी विस्तार’ बताते हुए खारिज कर दिया। मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि नेपाल के ये दावे न तो वैध हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों या साक्ष्यों पर आधारित हैं। इसके अलावा भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत “नेपाल के साथ रचनात्मक बातचीत” के लिए हमेशा तैयार है।
नेपाल ने अपने विरोध में 1816 की सुगौली संधि का हवाला देते हुए कहा है कि लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी उसके अभिन्न अंग हैं। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने बताया कि यह कदम राजनीतिक दलों से परामर्श के बाद उठाया गया है।
भारत का रुख—पुराना और स्थापित मार्ग
भारत ने स्पष्ट किया कि लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा का स्थापित मार्ग रहा है और यह कोई नया विकास नहीं है। भारत ने कहा कि दशकों से तीर्थयात्री इसी रास्ते से यात्रा करते आ रहे हैं। नेपाल इससे पहले भी इस मुद्दे पर आपत्ति जता चुका है। पिछले साल अगस्त में भी नेपाल ने इसी तरह का विरोध दर्ज कराया था।
लिपुलेख दर्रा भारत, नेपाल और चीन के त्रिकोणीय जंक्शन पर स्थित है। 1816 की सुगौली संधि, जो एंग्लो-गोरखा युद्ध के बाद हुई थी, आज भी इस सीमा विवाद का मुख्य आधार बनी हुई है।
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