नई दिल्ली, 14 अप्रैल : संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा जारी हालिया रिपोर्ट में पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव को लेकर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, अगर यह संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है, तो भारत की अर्थव्यवस्था और आम जनजीवन पर गंभीर असर पड़ सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में गरीबी दर 23.9% से बढ़कर 24.2% तक पहुंच सकती है। इससे करीब 24,64,698 लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाएंगे। कुल गरीबों की संख्या बढ़कर 35.40 करोड़ तक पहुंचने की आशंका है।
तेल और गैस आयात पर भारी निर्भरता
भारत की ऊर्जा जरूरतें बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं। देश 90% से अधिक तेल आयात करता है, इसमें से 40% कच्चा तेल और 90% एलपीजी खाड़ी देशों से आता है। ऐसे में पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से ईंधन कीमतों में उछाल और सप्लाई में बाधा का खतरा है। भारत अपने कुल उर्वरक आयात का 45% हिस्सा खाड़ी देशों से लेता है।
यदि संकट जून तक जारी रहा, तो खरीफ सीजन प्रभावित हो सकता है।
वर्तमान यूरिया स्टॉक: 6.114 मिलियन टन, यह स्टॉक सीमित समय के लिए ही पर्याप्त माना जा रहा है। इससे किसानों को उर्वरक की कमी का सामना करना पड़ सकता है।अक्टूबर 2024 तक के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 93.7 लाख भारतीय गल्प सहयोग परिषद देशों में काम कर रहे हैं। ये प्रवासी भारत में आने वाले कुल 38–40% रेमिटेंस भेजते हैं। क्षेत्र में आर्थिक मंदी के कारण इनकी आय घट सकती है, जिससे भारत में उनके परिवारों की खरीद शक्ति प्रभावित होगी।
MSME सेक्टर पर बढ़ता दबाव
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (MSME) भी इस संकट से अछूते नहीं रहेंगे। प्रमुख प्रभावित क्षेत्र: रत्न-आभूषण, कपड़ा उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, कच्चे माल की कमी और निर्यात में देरी के कारण : छंटनी बढ़ सकती है, काम के घंटे घटाए जा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया का संकट लंबा खिंचता है, तो भारत को महंगाई, बेरोजगारी और आपूर्ति संकट जैसे कई मोर्चों पर एक साथ दबाव झेलना पड़ सकता है।

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